top of page
खोज करे

राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: आपके लिए इसका क्या मतलब है

14 सित॰
8 मिनट पठन

पिछले कुछ सालों की खबरें देखी हों तो आपने "राजद्रोह" शब्द बार-बार सुना होगा — पत्रकारों, एक्टिविस्टों, छात्रों, यहां तक कि आम नागरिकों पर भी किसी बात या पोस्ट को लेकर केस दर्ज होने की खबरों में। और इन्हीं खबरों में कहीं न कहीं "सुप्रीम कोर्ट" का ज़िक्र भी आया होगा।

तो सुप्रीम कोर्ट ने आखिर तय क्या किया? क्या भारत में राजद्रोह अब भी अपराध है? क्या पुलिस आज भी इस कानून के तहत गिरफ्तार कर सकती है? सच कहें तो जवाब उतना सीधा नहीं है जितना किसी एक हेडलाइन में समा सके — और यही वजह है कि इस लेख में हम इसे विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।


पहले जानें, राजद्रोह कानून है क्या

भारत में राजद्रोह का प्रावधान भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A से आता है, जिसके तहत सरकार के खिलाफ "घृणा या अवमानना" फैलाने या "असंतोष भड़काने" की कोशिश करने वाले को सज़ा दी जाती थी। सज़ा उम्रकैद तक हो सकती थी।

यह कानून आज़ाद भारत ने खुद के लिए नहीं बनाया था। इसे अंग्रेज़ों ने 1870 में इसलिए बनाया था ताकि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बोलने वालों को चुप कराया जा सके। बाल गंगाधर तिलक इसी कानून के तहत दोषी ठहराए गए थे। महात्मा गांधी को भी — जिन्होंने अपने ही राजद्रोह मुकदमे के दौरान अदालत से कहा था कि यह भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं में "नागरिक की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाई गई सबसे प्रमुख धारा" है।

आज़ादी के बाद भी किसी ने इसे हटाया नहीं। यह किताबों में बना रहा, और दशकों तक इसका इस्तेमाल होता रहा — नेताओं, कार्टूनिस्टों, छात्रों, नए कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले किसानों और उन सबको कवर करने वाले पत्रकारों के खिलाफ भी।


1962 का वह केस जिसने नियम तय किए: केदारनाथ सिंह

हाल के विवाद से बहुत पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में एक बार धारा 124A की जांच की थी, केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य केस में। पांच जजों की बेंच ने इस कानून को संवैधानिक माना, लेकिन एक अहम सीमा भी तय की — सरकार की आलोचना करना, चाहे वह कितने ही तीखे शब्दों में क्यों न हो, राजद्रोह नहीं है। सिर्फ ऐसा बयान जो हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काए, इसके दायरे में आता है।

सैद्धांतिक रूप से इससे ज़्यादातर राजनीतिक आलोचना को सुरक्षा मिल जानी चाहिए थी। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ। देशभर में पुलिस कार्टून, नारों, ट्वीट्स और लेखों पर राजद्रोह के केस दर्ज करती रही, जिनका हिंसा भड़काने से कोई लेना-देना नहीं था। सज़ा कम ही मिलती थी — नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बार-बार दिखाते हैं कि बहुत कम राजद्रोह के केस दोषसिद्धि तक पहुंचते हैं — लेकिन गिरफ्तारी, FIR और महीनों-सालों चलने वाला मुकदमा ही कई लोगों के लिए किसी सज़ा से कम नहीं था।


2022: वह आदेश जिसने सब कुछ बदल दिया

2021 तक सुप्रीम कोर्ट खुद इस स्थिति से साफ तौर पर असहज नज़र आने लगा था। एक सुनवाई में तत्कालीन चीफ जस्टिस एन.वी. रमना ने धारा 124A की तुलना "बढ़ई के हाथ में लकड़ी काटने की आरी" से की, जिसका इस्तेमाल "पूरे जंगल को काटने" के लिए किया जा रहा था। कोर्ट ने सीधे केंद्र सरकार से पूछा कि गांधी और तिलक जैसे लोगों को जेल भेजने वाला यह औपनिवेशिक कानून आज़ाद भारत में अब भी क्यों मौजूद है।

पहले इस कानून का बचाव करने के बाद सरकार ने कोर्ट से कहा कि वह खुद इस प्रावधान की समीक्षा करना चाहती है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई 2022 को इस विषय पर अपना सबसे अहम आदेश पारित किया — एस.जी. वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ मामले में। तत्कालीन CJI रमना की अगुवाई वाली बेंच ने आदेश दिया कि:

  • जब तक समीक्षा पूरी नहीं होती, धारा 124A के तहत कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी।

  • इस धारा के तहत सभी लंबित मुकदमे, अपीलें और कार्यवाही रोक दी जाएंगी।

  • जो लोग पहले से राजद्रोह के आरोप में जेल में हैं, वे ज़मानत के लिए अदालत जा सकते हैं।

  • राज्यों को इस अवधि में इस धारा का बिल्कुल इस्तेमाल न करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

यह असामान्य कदम था। अदालतें आम तौर पर किसी मामले की सुनवाई लंबित रहते हुए पूरे कानून को रोक नहीं देतीं — वे संवैधानिकता पर फैसला देती हैं और वहीं बात खत्म हो जाती है। 2022 का यह आदेश कानून को खारिज किए बिना उसे व्यावहारिक रूप से ठंडे बस्ते में डाल गया, और इसी वजह से अक्सर गलत तरीके से यह खबर चली कि "राजद्रोह खत्म कर दिया गया है।" ऐसा नहीं हुआ था। धारा 124A तब भी मौजूद थी; बस उसका सक्रिय इस्तेमाल नहीं हो सकता था।


2023: बड़ी बेंच के पास भेजा गया मामला

अगला बड़ा कदम सितंबर 2023 में आया। तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने माना कि असली सवाल — क्या धारा 124A संविधान का उल्लंघन करती है — तीन जजों की बेंच के तय करने लायक नहीं है, क्योंकि 1962 का केदारनाथ सिंह फैसला पांच जजों की बेंच से आया था। किसी पुराने संविधान पीठ के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए आम तौर पर उतनी ही या उससे बड़ी बेंच चाहिए होती है।

कोर्ट ने एक और अहम बात कही: उसने सरकार की यह मांग ठुकरा दी कि पुराने राजद्रोह प्रावधान की जगह नए आपराधिक कानूनों के आने तक इंतज़ार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि भले ही संसद आगे चलकर धारा 124A को निरस्त कर दे, इससे पुराने कानून के तहत लंबित हज़ारों FIR और मुकदमे अपने आप हल नहीं हो जाएंगे। किसी को तो यह तय करना ही होगा कि मूल आरोप संवैधानिक रूप से सही था या नहीं।

संविधान पीठ के पास भेजा गया यह मामला आज भी लंबित है।


अब आई धारा 152 BNS: पुरानी शराब, नई बोतल?

यह मामला अदालत में लंबित था, उसी दौरान संसद ने पूरी IPC को ही बदल डाला। 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 ने भारत की मुख्य आपराधिक संहिता की जगह ले ली, और धारा 124A को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया गया।

लेकिन कानून की किताब से "राजद्रोह" शब्द हटने का मतलब यह नहीं था कि वह सोच भी साथ ही गायब हो गई। BNS की धारा 152 उन कृत्यों को अपराध मानती है जो अलगाव, सशस्त्र विद्रोह, विघटनकारी गतिविधियों या अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देकर "भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालते" हैं — और इसकी अधिकतम सज़ा भी उम्रकैद ही है।

याचिकाकर्ता — जिनमें वही एस.जी. वोम्बटकेरे भी शामिल थे जिन्होंने धारा 124A को चुनौती दी थी — इसे सुधार मानने को तैयार नहीं थे। उनकी दलील सीधी थी: किसी प्रावधान का नाम बदलकर "राजद्रोह" शब्द हटा देना काफी नहीं, अगर उसके तहत जो व्यवहार दंडनीय है — यानी सरकार को नागवार लगने वाली आलोचना — वह नहीं बदला, तो संवैधानिक समस्या भी कहीं नहीं गई।

अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले पर सुनवाई ज़रूरी है और धारा 152 BNS को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। इसी दौरान असल मामलों में भी यह प्रावधान परखा जा रहा था। पत्रकार अभिसार शर्मा पर असम में ज़मीन आवंटन की आलोचना करने वाले एक वीडियो को लेकर धारा 152 के तहत FIR दर्ज हुई। द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और सलाहकार संपादक करण थापर पर भी असम में ही एक प्रकाशित लेख को लेकर केस दर्ज हुआ, और सुप्रीम कोर्ट को उन्हें गिरफ्तारी से बचाने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा, साथ ही कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि क्या इस प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना ही इसे असंवैधानिक बना सकती है।


2026 में स्थिति क्या है

अभी की सही स्थिति यह है:

धारा 124A (पुराने लंबित मुकदमों के लिए) और धारा 152 BNS (जुलाई 2024 के बाद दर्ज मामलों के लिए), दोनों की संवैधानिक वैधता पर अभी फैसला नहीं आया है। संविधान पीठ ने अभी तक किसी पर भी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक छोटे, व्यावहारिक सवाल पर स्पष्टीकरण दिया: 2022 के रोक वाले आदेश से पहले जो राजद्रोह के मुकदमे शुरू हो चुके थे, उनका क्या होगा? कोर्ट ने कहा कि ये लंबित मुकदमे और अपीलें जारी रह सकती हैं, लेकिन सिर्फ तब जब आरोपी को इस पर कोई आपत्ति न हो। यह इस बात पर फैसला नहीं था कि राजद्रोह संवैधानिक है या नहीं — यह सालों से अटके पड़े आधे-अधूरे मुकदमों का बोझ कम करने के लिए लिया गया एक प्रशासनिक फैसला था।

तो अगर आप सोच रहे हैं कि "क्या भारत में अभी राजद्रोह कानूनी है" — तो सही जवाब यह है कि मूल सवाल अभी भी खुला है। नए मामलों के लिए धारा 124A का इस्तेमाल नहीं हो सकता। धारा 152 BNS तकनीकी रूप से इस्तेमाल की जा सकती है, और हो भी रही है, लेकिन यह अदालत की गहरी निगरानी में है, और बड़ा संवैधानिक सवाल सुलझने तक कोर्ट ने ऐसी FIR से लोगों को बचाने में दिलचस्पी भी दिखाई है जो ज़्यादा ही आगे बढ़ती नज़र आती हैं।


यह आपके लिए असल में मायने क्यों रखता है

इसे सिर्फ पत्रकारों और एक्टिविस्टों से जुड़ी खबर मानना आसान है, लेकिन जिन सवालों से कोर्ट जूझ रहा है, वे हर उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जो सार्वजनिक रूप से कुछ लिखता, बोलता या पोस्ट करता है — एक कॉलेज छात्र जो ऑनलाइन कोई तीखी राय शेयर करता है, एक स्थानीय पत्रकार जो किसी प्रदर्शन को कवर करता है, या एक नागरिक जो सोशल मीडिया पर राज्य सरकार की शिकायत करता है।

यहां संविधान के दो अधिकार आपस में टकराते हैं। अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19(2) राज्य को भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इस स्वतंत्रता पर "उचित प्रतिबंध" लगाने की इजाज़त देता है। इस बात पर शायद ही किसी को एतराज़ हो कि किसी देश को हिंसा भड़काने या राष्ट्रीय एकता को असली खतरे से बचाने वाले कानूनों की ज़रूरत होती है। असली मतभेद इस बात पर है कि व्यवहार में यह सीमा कितनी ढीली खींची जाती है — और गलत तरीके से दर्ज हुई FIR किसी की ज़िंदगी को कितना नुकसान पहुंचा देती है, इससे पहले कि अदालत यह तय करे कि वह कभी दोषी था ही नहीं।


एक झलक में तुलना: पहले बनाम अब


धारा 124A, IPC (1870–2024)

धारा 152, BNS (2024–वर्तमान)

"राजद्रोह" शब्द का इस्तेमाल

हां

नहीं

अधिकतम सज़ा

उम्रकैद

उम्रकैद

वर्तमान स्थिति

निरस्त, लेकिन पुराने मामले अभी भी लंबित

लागू, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के तहत

सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख

मई 2022 से रुका हुआ; आरोपी की सहमति से पुराने मुकदमे फिर शुरू हो सकते हैं

संवैधानिक वैधता कोर्ट में लंबित; कुछ मामलों में व्यक्तिगत सुरक्षा दी गई

निष्कर्ष

राजद्रोह के सवाल पर अब तक ऐसा कोई एक, अंतिम "सुप्रीम कोर्ट का फैसला" नहीं आया है जिसने इसे हमेशा के लिए सुलझा दिया हो — भले ही कभी-कभी इसे ऐसे ही रिपोर्ट किया जाता हो। इसके बजाय जो चल रहा है वह एक धीमी, अभी भी अधूरी प्रक्रिया है — 2022 का वह आदेश जिसने धारा 124A को रोक दिया, 2023 में बड़ी बेंच को भेजा गया मामला जिस पर अभी फैसला नहीं आया, और अब इसकी उत्तराधिकारी धारा 152 BNS को दी गई नई चुनौती, जो उसी अदालत में अपना रास्ता तय कर रही है।

फिलहाल सबसे सटीक बात यही कही जा सकती है: राजद्रोह की जगह लेने वाला कानून किताबों में है और कुछ राज्यों में इसका इस्तेमाल भी हो रहा है, लेकिन उसी अदालत की करीबी निगरानी में है जो आखिरकार उसका भविष्य तय करेगी। जब तक संविधान पीठ अपना फैसला नहीं सुनाती, यह भारतीय संवैधानिक कानून के सबसे करीब से देखे जाने वाले लंबित मामलों में से एक बना रहेगा — और अगर आपको इस बात की परवाह है कि आलोचना और अपराध के बीच की रेखा असल में कहां खींची जाती है, तो इस पर नज़र बनाए रखना ज़रूरी है।

टिप्पणियां


GuidanceHubLegal

​

The law is everywhere. We uncover what often goes unnoticed.

 

Explore laws, rights, legal developments, and overlooked legal questions across India and the United States.

Explore:

​

Home

About

Blog

bottom of page