top of page
खोज करे

बच्चे से मिलने के अधिकार (Child Visitation Rights) के लिए याचिका कैसे दायर करें

28 अग॰
9 मिनट पठन

तलाक या अलगाव अपने आप में मुश्किल होता है। जब बात बच्चे की आती है, तो सबसे तकलीफदेह सवाल यही बनता है कि बच्चे से कौन, कब और कितनी बार मिल सकेगा। अगर आप वो माता-पिता हैं जिनके पास बच्चे की रोज़मर्रा की कस्टडी नहीं है, तो भारतीय कानून आपको बेसहारा नहीं छोड़ता। आप फैमिली कोर्ट में जाकर विज़िटेशन राइट्स (मिलने का अधिकार) मांग सकते हैं, ताकि बच्चे की ज़िंदगी में आपकी मौजूदगी बनी रहे।

इस लेख में हम बताएंगे कि भारतीय कानून के तहत विज़िटेशन राइट्स का असल मतलब क्या है, इसके लिए याचिका कौन दायर कर सकता है, याचिका दायर करने का पूरा तरीका, किन दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ेगी, और कोर्ट फ़ैसला देने से पहले किन बातों पर ध्यान देता है।

नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। कस्टडी और विज़िटेशन के मामले हर परिवार की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं, इसलिए याचिका दायर करने से पहले किसी फैमिली लॉ वकील से सलाह ज़रूर लें।


विज़िटेशन राइट्स का मतलब क्या है

विज़िटेशन राइट्स उस माता-पिता को मिलते हैं जिनके पास बच्चे की फिज़िकल कस्टडी नहीं है, ताकि वे तय समय पर बच्चे से मिल सकें, बात कर सकें या साथ समय बिता सकें। कस्टडी यह तय करती है कि बच्चा रोज़ाना कहाँ रहेगा; विज़िटेशन यह सुनिश्चित करता है कि दूसरे माता-पिता से बच्चे का रिश्ता बना रहे। भारतीय अदालतें इसे किसी माता-पिता पर एहसान की तरह नहीं देखतीं। सुप्रीम कोर्ट कई फ़ैसलों में यह कह चुका है कि इसमें बच्चे का हक़ उतना ही बड़ा है जितना किसी माता-पिता का, क्योंकि किसी एक अभिभावक से संपर्क टूटना बच्चे पर लंबे समय तक असर डाल सकता है।

विज़िटेशन का मतलब सिर्फ़ आमने-सामने मिलना ही नहीं है। फ़ोन कॉल, वीडियो कॉल और छुट्टियों के दौरान साथ रहने को भी अदालतें अब मान्यता देती हैं, खासकर तब जब माता-पिता अलग-अलग शहरों या देशों में रहते हों।


आपके मामले पर कौन-सा कानून लागू होता है

भारत में कस्टडी को लेकर एक समान कानून नहीं है। आपकी याचिका किस कानून के तहत चलेगी, यह आपके धर्म पर और इस बात पर निर्भर करता है कि क्या आप तलाक की कार्यवाही के साथ यह मांग रहे हैं या अलग से।

  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) – धारा 26 के तहत कोर्ट हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन दंपतियों के तलाक के मामले में बच्चे की कस्टडी, गुज़ारा भत्ता और विज़िटेशन से जुड़े आदेश दे सकता है।

  • हिंदू अवयस्कता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 (Hindu Minority and Guardianship Act) – हिंदू नाबालिगों के संरक्षण से जुड़ा है और गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट के साथ मिलकर काम करता है।

  • गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 (Guardians and Wards Act) – यह धर्म-निरपेक्ष कानून है जो सभी पर लागू होता है। ज़्यादातर स्वतंत्र विज़िटेशन याचिकाएं, जिनमें मुस्लिम, ईसाई या पारसी माता-पिता की याचिकाएं भी शामिल हैं, इसी एक्ट के तहत दायर होती हैं।

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act) – इस एक्ट के तहत हुई शादी वाले दंपतियों पर लागू होता है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।

  • भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 (Indian Divorce Act) – ईसाई दंपतियों के तलाक के मामलों में कस्टडी और एक्सेस से जुड़ा प्रावधान करता है।

कानून चाहे जो भी लागू हो, अदालत की असली कसौटी एक ही रहती है: कौन-सा प्रबंध बच्चे के हित में सबसे बेहतर है। सुप्रीम कोर्ट ने Rosy Jacob v. Jacob A. Chakramakkal मामले में साफ़ कहा था कि गार्डियनशिप कानून का मकसद सिर्फ़ यह तय करना नहीं है कि बच्चा शारीरिक रूप से किसके पास रहेगा, बल्कि उसकी सेहत, शिक्षा और परवरिश की रक्षा करना है।


याचिका कौन दायर कर सकता है

  • गैर-कस्टोडियल माता-पिता – जिस पिता या माँ के पास फिज़िकल कस्टडी नहीं है, वे सबसे आम याचिकाकर्ता होते हैं।

  • दादा-दादी और करीबी रिश्तेदार – भारतीय कानूनों में दादा-दादी के विज़िटेशन राइट्स के बारे में सीधा प्रावधान नहीं है, लेकिन गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 7, 10 और 25 के तहत अदालतें यह अधिकार दे चुकी हैं, बशर्ते यह साबित हो कि बच्चे के साथ उनका पहले से गहरा जुड़ाव है और यह रिश्ता बच्चे के हित में है।

  • विदेश में रह रहे माता-पिता – NRI माता-पिता भी विज़िटेशन के लिए याचिका दायर कर सकते हैं, और ऐसे मामलों में अदालतें वीडियो कॉलिंग व तय छुट्टियों के दौरान मुलाक़ात जैसे व्यावहारिक हल स्वीकार करती रही हैं।


याचिका कहाँ दायर करें

याचिका उस फैमिली कोर्ट (या जहाँ फैमिली कोर्ट न हो, वहाँ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) में दायर करनी होती है जिसके क्षेत्राधिकार में बच्चा सामान्यतः रहता है — ज़रूरी नहीं कि यह वही जगह हो जहाँ शादी हुई थी या जहाँ आप रहते हैं। यह गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 9 में तय है। अगर बच्चा हाल ही में किसी दूसरे शहर शिफ्ट हुआ है, तो क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद हो सकता है, इसलिए याचिका दायर करने से पहले अपने वकील से इसकी पुष्टि करवा लें।


याचिका दायर करने की पूरी प्रक्रिया

1. फैमिली लॉ वकील से सलाह लें

कस्टडी के मामले खुद ड्राफ्ट करने वाली चीज़ नहीं हैं। एक वकील आपकी परिस्थिति समझकर बताएगा कि आपको सिर्फ़ विज़िटेशन मांगनी चाहिए या कस्टडी के साथ भी, और यह सुनिश्चित करेगा कि याचिका में सही धाराओं का हवाला दिया गया हो।

2. दस्तावेज़ इकट्ठा करें

अदालत को सबूत चाहिए, सिर्फ़ दावे नहीं। आमतौर पर इन दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ती है:

  • शादी का प्रमाणपत्र (या रिश्ते का सबूत, जहाँ लागू हो)

  • बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र

  • दोनों माता-पिता के पहचान और पते के प्रमाण (आधार, पासपोर्ट, बिजली-पानी का बिल)

  • तलाक या न्यायिक अलगाव का आदेश, अगर मौजूद हो

  • आय का प्रमाण — सैलरी स्लिप, ITR या बैंक स्टेटमेंट

  • कस्टडी या गुज़ारा भत्ता से जुड़ा कोई भी पुराना कोर्ट आदेश

  • बच्चे के साथ आपके रिश्ते का सबूत — फ़ोटो, मैसेज, स्कूल से संपर्क का रिकॉर्ड — अगर दूसरा पक्ष आपकी भूमिका पर सवाल उठाए

3. याचिका तैयार करें और दायर करें

याचिका में यह बताना होता है कि आप कौन हैं, बच्चे से आपका रिश्ता क्या है, आप विज़िटेशन क्यों मांग रहे हैं, आप कैसा शेड्यूल चाहते हैं (वीकेंड, छुट्टियाँ, वीडियो कॉल, या इनका मिश्रण), और इसके पीछे के तथ्य क्या हैं। अगर आपका कस्टडी या तलाक का मामला पहले से चल रहा है, तो अक्सर विज़िटेशन उसी केस के तहत मांगी जा सकती है, अलग से नई याचिका दायर करने की ज़रूरत नहीं होती।

4. कोर्ट फीस जमा करें

गार्डियनशिप और कस्टडी याचिकाओं पर कोर्ट फीस मामूली होती है और हर राज्य के अपने कोर्ट फीस एक्ट के हिसाब से तय होती है, इसलिए सही रकम राज्य और कोर्ट के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। याचिका दायर करने से पहले अपने वकील या फैमिली कोर्ट रजिस्ट्री से मौजूदा फीस की पुष्टि कर लें।

5. दूसरे पक्ष को नोटिस

याचिका दायर होने के बाद अदालत दूसरे माता-पिता (प्रतिवादी) को नोटिस भेजती है, जो जवाब में सहमति, विरोध, या कोई और शेड्यूल सुझा सकते हैं।

6. मध्यस्थता (Mediation)

फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 के तहत फैमिली कोर्ट्स को पूरी सुनवाई से पहले सुलह की कोशिश करनी होती है। कई विज़िटेशन विवाद इसी चरण में मध्यस्थ की मदद से सुलझ जाते हैं, बिना लंबी सुनवाई के। अगर मध्यस्थता में दोनों पक्ष किसी शेड्यूल पर सहमत हो जाएं, तो कोर्ट उसे रिकॉर्ड करता है और यह लागू करने योग्य हो जाता है।

7. अंतरिम विज़िटेशन (Interim Visitation), अगर ज़रूरत हो

फ़ाइनल फ़ैसले का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं है। गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 12 के तहत, मुख्य याचिका पर सुनवाई चलते हुए भी अदालत अस्थायी आदेश दे सकती है, जिसमें अंतरिम विज़िटेशन भी शामिल है। अगर केस लंबा खिंचने की आशंका हो, तो यह विकल्प खासतौर पर उपयोगी है।

8. सुनवाई और सबूत

अगर मध्यस्थता नाकाम होती है, तो केस सुनवाई की ओर बढ़ता है जहाँ दोनों माता-पिता सबूत पेश करते हैं और विवादित मामलों में गवाह भी। अदालत बच्चे से सीधे और निजी तौर पर भी बात कर सकती है, बशर्ते बच्चा अपनी राय ज़ाहिर करने लायक उम्र का हो, और कोर्ट काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से रिपोर्ट भी मांग सकती है।

9. अंतिम आदेश

अदालत अंतिम आदेश में विज़िटेशन शेड्यूल स्पष्ट रूप से तय करती है — दिन, समय, बच्चे को लाने-ले जाने की व्यवस्था, छुट्टियों का बंटवारा, और फ़ोन या वीडियो कॉल कैसे होंगे। अस्पष्ट आदेश आगे चलकर नए विवाद पैदा करते हैं, इसलिए एक साफ़ और विस्तृत आदेश ही सही मायने में मददगार साबित होता है।

10. अपील, अगर ज़रूरत पड़े

अगर किसी भी पक्ष को आदेश से असंतोष है, तो वे फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 19 के तहत तय समय-सीमा के भीतर हाई कोर्ट में अपील कर सकते हैं। गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 12 के तहत दिए गए अंतरिम आदेशों को भी अदालतें अपील योग्य मान चुकी हैं।


फ़ैसला देने से पहले अदालत किन बातों पर ध्यान देती है

  • बच्चे की उम्र और, जहाँ लागू हो, बच्चे की अपनी इच्छा

  • हर माता-पिता की स्थिर और सुरक्षित माहौल देने की क्षमता

  • विज़िटेशन मांगने वाले माता-पिता का बच्चे के साथ मौजूदा जुड़ाव

  • हिंसा, उपेक्षा या नशे की लत का कोई इतिहास

  • व्यावहारिक पहलू — दोनों घरों के बीच दूरी, स्कूल का समय, और बच्चे की रोज़मर्रा की दिनचर्या

  • क्या किसी एक माता-पिता ने बिना ठोस वजह के बच्चे को दूसरे से दूर रखने की कोशिश की है

बिना उचित कारण विज़िटेशन रोकने वाले माता-पिता के खिलाफ अदालतें सख्त रुख़ अपना चुकी हैं। Yashita Sahu v. State of Rajasthan (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विज़िटेशन सिर्फ़ बेहद गंभीर परिस्थितियों में ही रोकी जानी चाहिए, और अदालतों को मुलाक़ात का तरीका व समय स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए, न कि अस्पष्ट छोड़ना चाहिए। इसी फ़ैसले में वीडियो कॉलिंग को भी एक वैध ज़रिया माना गया, खासकर तब जब नियमित मुलाक़ात व्यावहारिक न हो। Vivek Singh v. Romani Singh (2017) में कोर्ट ने बिना वजह बार-बार विज़िटेशन रोकने को parental alienation यानी बच्चे को एक माता-पिता से दूर करने की कोशिश माना, जो कस्टडी व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है।


अगर दूसरा पक्ष विज़िटेशन आदेश का पालन न करे

विज़िटेशन आदेश केवल सुझाव नहीं होता। अगर कस्टोडियल माता-पिता बार-बार तय मुलाक़ात रोकते हैं:

  • आप उसी फैमिली कोर्ट में जाकर कंटेम्प्ट (अवमानना) या एन्फोर्समेंट एप्लिकेशन दायर कर सकते हैं।

  • गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 45 के तहत, बच्चे की कस्टडी या प्रस्तुति से जुड़े आदेश की अवहेलना करने पर जुर्माना लगाया जा सकता है, और गंभीर मामलों में हिरासत भी हो सकती है।

  • बार-बार विज़िटेशन रोकना आगे चलकर कस्टडी व्यवस्था बदलवाने की वजह भी बन सकता है, जैसा कि पहले के फ़ैसलों में देखा गया है।

छूटी हुई मुलाक़ातों, मैसेज और संपर्क की कोशिशों का रिकॉर्ड ज़रूर रखें। अगर आपको दोबारा कोर्ट जाना पड़े, तो यह दस्तावेज़ीकरण काम आता है।


इस पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है

कोई तय समय-सीमा नहीं है, और यह काफ़ी हद तक इस पर निर्भर करता है कि मामला कितना विवादित है। अंतरिम विज़िटेशन आदेश कभी-कभी याचिका दायर करने के कुछ हफ़्तों के भीतर मिल जाता है, खासकर अगर दोनों पक्ष ज़्यादा विरोध न करें। पूरी तरह विवादित मामला, जो सुनवाई और सबूतों से गुज़रता है, कई महीनों से लेकर एक साल से ज़्यादा भी ले सकता है। मध्यस्थता से सुलझने वाले मामले आमतौर पर ट्रायल तक जाने वाले मामलों से जल्दी निपटते हैं।


कुछ व्यावहारिक सुझाव

  • दूसरे माता-पिता के साथ लिखित बातचीत (मैसेज, ईमेल) जितना हो सके शालीन रखें — अदालतें अक्सर व्हाट्सएप और ईमेल की बातचीत को व्यवहार के सबूत के तौर पर देखती हैं।

  • तय मुलाक़ातें न छोड़ें और बार-बार देर न करें; बाद में यह आपके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।

  • अगर आप बच्चे से दूर रहते हैं, तो याचिका में साफ़ तौर पर वीडियो कॉल या फ़ोन संपर्क का अधिकार मांगें, यह मानकर न बैठें कि अदालत खुद इसे जोड़ देगी।

  • अगर दादा-दादी या अन्य रिश्तेदार विज़िटेशन चाहते हैं, तो उन्हें यह दिखाना होगा कि बच्चे के साथ उनका वाकई गहरा रिश्ता है, सिर्फ़ कागज़ी पारिवारिक संबंध काफ़ी नहीं होगा।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या भारत में पिता को विज़िटेशन राइट्स मिल सकते हैं? हाँ। कस्टडी किसी के पास भी हो, पिता विज़िटेशन के लिए याचिका दायर कर सकते हैं, और जब तक कोई खास व दर्ज कारण न हो, अदालतें आमतौर पर यह अधिकार देती हैं।

क्या दादा-दादी को कानूनी रूप से विज़िटेशन का अधिकार है? इसके लिए कोई अलग कानून नहीं है, लेकिन गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत अदालतें दादा-दादी को विज़िटेशन दे चुकी हैं, अगर यह बच्चे के हित में साबित हो।

क्या विज़िटेशन राइट्स बाद में बदले जा सकते हैं? हाँ। कोई भी माता-पिता मौजूदा आदेश में बदलाव के लिए आवेदन कर सकते हैं, अगर हालात बदल जाएं — जैसे किसी शहर में शिफ्ट होना, स्कूल बदलना, या आदेश का लगातार पालन न होना।

क्या इस याचिका के लिए वकील रखना ज़रूरी है? कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं, लेकिन बेहद सलाह दी जाती है। कस्टडी मामलों में कई प्रक्रियात्मक और सबूत से जुड़ी बारीकियाँ होती हैं, जिन्हें बिना कानूनी मदद के सही तरीके से संभालना मुश्किल हो सकता है।

क्या सिर्फ़ वीडियो कॉल के ज़रिए भी विज़िटेशन हो सकती है? हाँ, खासकर तब जब माता-पिता दूर रहते हों। Yashita Sahu मामले सहित कई फ़ैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो कॉलिंग को संपर्क का एक वैध तरीका माना है।

अगर दूसरा पक्ष कोर्ट आदेश के बावजूद बार-बार मिलने से रोके तो क्या करें? आप उसी फैमिली कोर्ट में कंटेम्प्ट या एन्फोर्समेंट एप्लिकेशन दायर कर सकते हैं, और गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 45 के तहत आदेश न मानने पर जुर्माना या हिरासत हो सकती है।

टिप्पणियां


GuidanceHubLegal

​

The law is everywhere. We uncover what often goes unnoticed.

 

Explore laws, rights, legal developments, and overlooked legal questions across India and the United States.

Explore:

​

Home

About

Blog

bottom of page